जब आप 2,000 साल पुराने सोने के गहनों के बारे में सोचते हैं, तो दिमाग में अक्सर राजघरानों या युद्धों की तस्वीरें आती हैं। लेकिन थाईलैंड के पेत्चाबुरी (Phetchaburi) प्रांत में हाल ही में जो मिला, वह किसी राजा की कहानी नहीं है। यह कहानी है एक आम मगर बेहद अमीर भारतीय व्यापारी की, जो दो सहस्राब्दी पहले समंदर पार कर व्यापार करने गया था।
थाईलैंड के पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान सोने की दो प्राचीन अंगूठियाँ मिली हैं। इनमें से एक साधारण सोने का बैंड है, लेकिन दूसरी अंगूठी इतिहास प्रेमियों के होश उड़ा रही है। इस दूसरी अंगूठी पर प्राचीन भारत की ब्राह्मी लिपि (Brahmi script) में कुछ खुदा हुआ है। इस खोज ने भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच के सदियों पुराने व्यापारिक और सांस्कृतिक रिश्तों पर एक नई रोशनी डाली है। यह सिर्फ एक ज़ेवर नहीं, बल्कि एक प्राचीन पासपोर्ट या पहचान पत्र जैसा है जो साबित करता है कि उस दौर में भारतीय व्यापारी कितने रसूखदार थे।
क्या लिखा है इस रहस्यमयी अंगूठी पर
थाईलैंड के फाइन आर्ट्स डिपार्टमेंट (Fine Arts Department) के विशेषज्ञों ने जब इस अंगूठी की शुरुआती जांच की, तो उन्हें इस पर ब्राह्मी लिपि में "पुस रखितस" (pusarakhitasa) लिखा हुआ मिला। भारतीय संदर्भों और ज्योतिष के हिसाब से इसका सीधा मतलब होता है—"वह जिसकी रक्षा पुष्य नक्षत्र करता है" (the one protected by Pushya)।
भारतीय खगोल विज्ञान और हिंदू संस्कृति में पुष्य नक्षत्र को सबसे शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। आज भी भारत में लोग इस नक्षत्र में सोना खरीदना या नए काम की शुरुआत करना बेहद भाग्यशाली मानते हैं। 2,000 साल पहले भी सोच बिल्कुल वैसी ही थी। अंगूठी पर यह नाम या मंत्र लिखवाने का मतलब था कि इसका मालिक अपनी समुद्री यात्राओं और व्यापारिक सौदों में ईश्वरीय सुरक्षा चाहता था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंगूठी प्राचीन भारत के वैश्य समुदाय (वैश्या) के किसी अमीर व्यापारी की रही होगी। उस दौर में समंदर के रास्ते व्यापार करना जान जोखिम में डालने जैसा था। ऐसे में अपनी पहचान और आस्था को अंगूठी के ज़रिए साथ रखना एक आम बात थी।
चावल के खेत से कैसे निकला 2,000 साल पुराना इतिहास
यह पूरी खोज किसी फिल्मी कहानी जैसी है। इसी साल की शुरुआत में पेत्चाबुरी के बान लाट (Ban Lat) जिले के एक गाँव में स्थानीय किसान अपने चावल के खेत में काम कर रहे थे। तभी उन्हें ज़मीन के नीचे कांस्य (bronze) के प्राचीन ड्रमों के कुछ टुकड़े मिले। उन्होंने तुरंत इसकी जानकारी अधिकारियों को दी।
जब थाईलैंड के फाइन आर्ट्स डिपार्टमेंट ने फ़रवरी 2026 में यहाँ खुदाई शुरू की, तो उन्हें समझ आया कि यह कोई मामूली जगह नहीं है। इस जगह को डॉन याई थोंग (Don Yai Thong) पुरातात्विक स्थल नाम दिया गया। तब से लेकर अब तक यहाँ:
- कुल 8 मानव कंकाल मिल चुके हैं।
- भारी मात्रा में कांस्य और सोने के आभूषण बरामद हुए हैं।
- मिट्टी के प्राचीन बर्तन और अनुष्ठानिक वस्तुएं मिली हैं।
ये दोनों सोने की अंगूठियाँ भी पिछले हफ्ते एक कंकाल के ठीक पास से बरामद की गईं। कंकाल के पास इतने महंगे सोने और कांसे के आभूषणों का होना दिखाता है कि यह कोई सामान्य कब्रिस्तान् नहीं था। यह उस दौर के समाज के बेहद अमीर, संभ्रांत या उच्च वर्ग के लोगों का औपचारिक श्मशान या दफ़न स्थल रहा होगा।
आयरन एज और भारत-थाईलैंड का पुराना कनेक्शन
वैज्ञानिकों ने डॉन याई थोंग साइट को थाईलैंड के उत्तर-प्रागैतिहासिक काल यानी लौह युग (Iron Age) का बताया है। इसका समय लगभग 1,500 से 2,500 साल पुराना माना जा रहा है। यानी ईसा पूर्व की शुरुआती सदियों से लेकर ईसा के बाद के शुरुआती काल तक।
यह वही दौर था जब रोमन साम्राज्य से लेकर भारत के मौर्य और गुप्त काल के दौरान समुद्री व्यापार अपने चरम पर था। भारत के पूर्वी तटों (जैसे कलिंग या चोल साम्राज्य के प्रभाव वाले क्षेत्रों) से बड़े-बड़े जहाज़ मसाले, रत्न, रेशम और धातुओं के व्यापार के लिए सुवर्णभूमि (जिसे आज हम दक्षिण-पूर्व एशिया या थाईलैंड कहते हैं) की तरफ रवाना होते थे।
यह कोई पहली बार नहीं है जब थाईलैंड में ब्राह्मी लिपि मिली हो। इससे पहले क्रबी प्रांत के कलोंग थोम और चुम्फोन प्रांत के खाओ साम केओ में भी भारतीय लिपियों और कलाकृतियों के अवशेष मिल चुके हैं। लेकिन पेत्चाबुरी की यह खोज इसलिए अलग है क्योंकि यह बैंकॉक से महज़ 130 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है, जो दिखाता है कि भारतीय व्यापारियों की पहुंच थाईलैंड के अंदरूनी और मुख्य इलाकों तक कितनी गहरी थी।
अब इन बेशकीमती अंगूठियों का क्या होगा
फिलहाल इस पुरातात्विक स्थल पर खुदाई का काम एक महीने और चलने की उम्मीद है। इलाके में हो रही बारिश और भूजल (groundwater) के कारण कंकालों और कांस्य की चीज़ों को नुकसान पहुंचने का खतरा है, इसलिए पुरातत्वविद् बहुत तेज़ी से काम समेट रहे हैं।
इन दोनों सोने की अंगूठियों को सुरक्षा के लिहाज से रत्चाबुरी प्रांत के फरा नाखोन खिरी संग्रहालय (Phra Nakhon Khiri Museum) में रख दिया गया है। वहां वैज्ञानिक इन पर आगे की रिसर्च करेंगे ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह सोना भारत से लाया गया था या स्थानीय स्तर पर ही भारतीय कारीगरों या व्यापारियों ने इसे तैयार करवाया था। जल्द ही इसे आम जनता के देखने के लिए भी प्रदर्शित किया जाएगा।
अगर आप इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखते हैं, तो आने वाले दिनों में इस साइट से और भी कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं। इस खोज ने यह तो साफ कर दिया है कि आज जिन सीमाओं और देशों को हम नक्शे पर देखते हैं, दो हज़ार साल पहले के व्यापारियों के लिए वे मायने नहीं रखती थीं। उनका नेटवर्क और उनकी आस्था दोनों ही सात समंदर पार तक फैले हुए थे।