इज़रायल लेबनान शांति समझौते की राह में सबसे बड़ा रोड़ा क्या है

इज़रायल लेबनान शांति समझौते की राह में सबसे बड़ा रोड़ा क्या है

मिडिल ईस्ट सुलग रहा है और शांति की हर कोशिश किसी न किसी मोड़ पर आकर ठहर जाती है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में वाशिंगटन में एक ऐसी बात कही जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। रुबियो का मानना है कि इज़रायल और लेबनान के बीच शांति समझौता पूरी तरह मुमकिन है। वे कहते हैं कि दोनों देशों के बीच कोई असली दुश्मनी नहीं है। असल समस्या लेबनान का सरकार नहीं बल्कि वहां सक्रिय चरमपंथी संगठन हिज्बुल्लाह है।

वाशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत में रुबियो ने साफ किया कि जब तक हिज्बुल्लाह इज़रायल पर रॉकेट दागना बंद नहीं करता तब तक इज़रायल के पास अपनी आत्मरक्षा में सैन्य कार्रवाई करने का पूरा कानूनी और नैतिक हक है। उन्होंने साफ लहजे में लेबनान पर होने वाले इज़रायली हमलों को जायज ठहराया है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अप्रैल और मई 2026 के दौरान दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत के कई दौर वाशिंगटन में हो चुके हैं।

हिज्बुल्लाह और लेबनान की संप्रभुता का संकट

मार्को रुबियो का यह रुख अमेरिका की उस पुरानी नीति को दिखाता है जो इज़रायल के आत्मरक्षा के अधिकार को सर्वोपरि मानती है। रुबियो ने तर्क दिया कि इज़रायल लेबनान की जमीन पर कब्जा नहीं रखना चाहता। उसका दक्षिणी लेबनान में मौजूद होना महज एक अस्थायी सुरक्षा कदम है ताकि उत्तरी इज़रायल के नागरिकों को रॉकेट हमलों से बचाया जा सके।

समस्या तब और गहरी हो गई जब हिज्बुल्लाह के चीफ नईम कासिम ने लेबनान की लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए लोगों से सड़कों पर उतरने की अपील कर दी। रुबियो ने इस अपील को बेहद गैर-जिम्मेदाराना और देश को अराजकता में धकेलने की कोशिश बताया।

  • हिज्बुल्लाह लेबनान की चुनी हुई सरकार के फैसलों को लगातार चुनौती दे रहा है।
  • वह लेबनानी सेना की कमजोरी का फायदा उठाकर अपनी समानांतर सेना चला रहा है।
  • अमेरिका ने हाल ही में हिज्बुल्लाह के वित्तीय संस्थान अल-कर्द अल-हसन पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं जिससे संगठन बौखला गया है।

शांति वार्ता और जमीनी हकीकत का टकराव

साल 2026 की शुरुआत से ही इज़रायल और लेबनान के बीच दशकों बाद पहली बार वाशिंगटन में सीधी शांति वार्ता शुरू हुई। राष्ट्रपति जोसेफ औन और प्रधानमंत्री नवाफ सलाम के नेतृत्व वाली नई लेबनानी सरकार खुद चाहती है कि देश से सभी गैर-राज्य सशस्त्र संगठनों को खत्म किया जाए और लेबनानी सेना का पूरे भूगोल पर नियंत्रण हो।

लेकिन हिज्बुल्लाह इस पूरी प्रक्रिया को नाकाम करने पर तुला है। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2026 से जारी ताज़ा संघर्ष में अब तक 2600 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और दस लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। इज़रायल का कहना है कि जब तक हिज्बुल्लाह को पूरी तरह निशस्त्र नहीं किया जाता तब तक कोई भी युद्धविराम स्थायी नहीं हो सकता।

अमेरिकी मध्यस्थता में चल रही इस बातचीत का अगला दौर जून के शुरुआती हफ्ते में होना तय हुआ है। इसके ठीक पहले सैन्य अधिकारियों के बीच भी एक अहम बैठक होने वाली है ताकि दक्षिणी लेबनान से इज़रायली सेना की वापसी और वहां लेबनानी राष्ट्रीय सेना की तैनाती का खाका तैयार किया जा सके।

आम लोगों पर प्रतिबंधों और युद्ध की दोहरी मार

हिज्बुल्लाह सिर्फ इज़रायल के लिए ही नहीं बल्कि लेबनान के आम नागरिकों के लिए भी मुसीबत बन चुका है। अल-कर्द अल-हसन नाम का जो वित्तीय संस्थान हिज्बुल्लाह से जुड़ा है वह लेबनान के शिया समुदाय को ब्याज मुक्त कर्ज देता रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद इस बैंक का कामकाज ठप होने की कगार पर है जिससे आम गरीब लोग पिस रहे हैं।

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नईम कासिम इसी का फायदा उठाकर जनता को सरकार के खिलाफ भड़काना चाहते हैं ताकि उनका खुद का वजूद बचा रहे। रुबियो ने दोटूक कहा कि एक आतंकी संगठन पूरे देश को बंधक बनाकर रखे वह दौर अब खत्म होने जा रहा है। अमेरिका और इज़रायल दोनों का मानना है कि लेबनान की सरकार को मजबूत करना ही इस संकट का एकमात्र समाधान है।

अगर आप मिडिल ईस्ट की इस भू-राजनीति को करीब से समझना चाहते हैं तो आपको हिज्बुल्लाह के वित्तीय नेटवर्क और लेबनान की आंतरिक राजनीति पर नजर रखनी होगी। अगली सैन्य समन्वय बैठक के नतीजों और जून में होने वाली चौथे दौर की बातचीत पर दुनिया भर के राजनयिकों की निगाहें टिकी हैं क्योंकि यही तय करेगा कि लेबनान को हिज्बुल्लाह के चंगुल से आज़ादी मिलेगी या यह इलाका जंग की आग में झुलसता रहेगा।

DB

Dominic Brooks

As a veteran correspondent, Dominic Brooks has reported from across the globe, bringing firsthand perspectives to international stories and local issues.